पहनने के ज़ेवर पर ज़कात: चार मसलक
अगर आपके पास सोने या चाँदी के ज़ेवर हैं जिन्हें आप वाक़ई पहनती हैं, चाहे रोज़मर्रा हो या सिर्फ़ शादी-ब्याह और ख़ास मौक़ों पर, तो इस पर ज़कात है या नहीं, इसका पूरी दुनिया में एक ही जवाब नहीं है। यह ज़कात के उन चंद मसलों में से एक है जहाँ चारों बड़े सुन्नी मसलक वाक़ई एक-दूसरे से इख़्तिलाफ़ रखते हैं, और यह इख़्तिलाफ़ छोटी-मोटी बातों में नहीं बल्कि बुनियादी उसूल में है। इसे सही तरह समझना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि बहुत से घरों में, ख़ासकर शादीशुदा औरतों के लिए, ज़ेवर ही अक्सर उनकी सबसे बड़ी निजी दौलत होती है, तो सही जवाब का मतलब हो सकता है हर साल कुछ भी न देना या फिर एक अच्छी-ख़ासी रक़म अदा करना।
इख़्तिलाफ़ की असल बात एक जुमले में
हनफ़ी मसलक के मुताबिक़ हर सोना-चाँदी, चाहे वह ज़ेवर की शक्ल में हो या न हो, ज़कात के दायरे में आता है, सिर्फ़ इसलिए कि वह सोना-चाँदी है; उसे पहनने या ज़ीनत के लिए इस्तेमाल करने से उसकी असल हैसियत, यानी एक माली धातु होना, नहीं बदलती। इसके उलट मालिकी, शाफ़ई और हंबली मसलक कहते हैं कि जो ज़ेवर वाक़ई पहनने और जायज़ ज़ीनत के लिए रखे गए हैं, उन पर बिल्कुल ज़कात नहीं है, क्योंकि उनकी दलील है कि ऐसे ज़ेवर “बढ़ने या जमा होने वाली दौलत” की कैटेगरी से निकलकर एक इस्तेमाल होने वाली निजी चीज़ बन जाते हैं, ठीक कपड़ों या घर के सामान की तरह। दोनों ही राय सदियों से मुस्तनद उलमा की तरफ़ से दलील के साथ पेश की गई हैं और आज भी बड़ी तादाद में मुसलमान इन पर अमल करते हैं, तो किसी एक को कमज़ोर या ग़ैर-मुस्तनद नहीं कहा जा सकता।
हनफ़ी मसलक सोने को बाक़ी चीज़ों से अलग क्यों मानता है
हनफ़ी फ़ुक़हा की दलील यह है कि सोना-चाँदी अपनी फ़ितरत से ही “बढ़ने वाली दौलत” (माल-ए-नामी) हैं, चाहे उनकी शक्ल कुछ भी हो, क्योंकि तारीख़ भर में यही दोनों धातुएँ ख़ुद करेंसी की हैसियत रखती रही हैं, महज़ सामान बनाने की चीज़ नहीं। गाड़ी, मकान या कपड़ों की अलमारी ज़कात से इसलिए मुस्तसना हैं क्योंकि वे अपनी फ़ितरत से करेंसी नहीं हैं। सोना-चाँदी अलग हैं: हार या कंगन की शक्ल में ढलने के बाद भी उनकी असल धातु वही रहती है जो पहले थी, और उसे वापस कच्ची धातु या सिक्के की शक्ल में पिघलाने के लिए सिर्फ़ गर्मी की ज़रूरत होती है, कुछ और नहीं। इसी वजह से हनफ़ी मसलक सोने-चाँदी के ज़ेवर पर भी उसी 2.5% की दर से ज़कात लगाता है जो किसी भी और सोने-चाँदी पर लगती है, यानी उसके वज़न के हिसाब से, चाहे उसकी बनावट, कारीगरी या पहनने की तादाद कुछ भी हो।
बाक़ी तीन मसलक असली ज़ीनत के ज़ेवर को क्यों छूट देते हैं
मालिकी, शाफ़ई और हंबली मसलक उन रिवायात का हवाला देते हैं जिनमें नबी करीम (स.अ.व.) के सहाबा की औरतों का सोने के ज़ेवर पहनना बयान हुआ है, बिना इस बात का ज़िक्र किए कि उन्होंने ख़ासतौर पर उस ज़ेवर पर ज़कात अदा की हो, साथ ही इस आम उसूल का भी सहारा लेते हैं कि जायज़ तरीक़े से इस्तेमार होने वाली निजी चीज़ें ज़कात के दायरे से बाहर हैं, ठीक जैसे रहने का घर या आने-जाने की गाड़ी। इस राय के मुताबिक़ असल कसौटी यह है कि क्या ज़ेवर वाक़ई और लगातार जायज़ मक़सद के लिए ज़ीनत में इस्तेमाल हो रहा है। जो ज़ेवर कोई औरत वाक़ई पहनती है, चाहे रोज़ाना हो या सिर्फ़ ख़ास मौक़ों पर, और जिसे महज़ जमा करके या निवेश की तरह ज़ीनत का जामा पहनाकर नहीं रखा गया, वह इन तीनों मसलकों के मुताबिक़ ज़कात के दायरे से पूरी तरह बाहर है, चाहे उसकी क़ीमत कितनी भी हो।
“असली ज़ाती इस्तेमाल” की असल शर्तें क्या हैं
उस अकसरियती राय के अंदर भी, जो पहने जाने वाले ज़ेवर को छूट देती है, उलमा ने कुछ असली शर्तें रखी हैं, और जो ज़ेवर इन शर्तों पर पूरा नहीं उतरता वह नरम मसलकों के मुताबिक़ भी दोबारा ज़कात के दायरे में आ जाता है। पहली शर्त यह है कि मिक़दार उस शख़्स के समाजी और मआशी हालात के हिसाब से मुनासिब हो; अगर कोई आम घराना इतनी ज़्यादा तादाद में सोना रखे जितना कोई भी समझदार शख़्स कभी पहन ही नहीं सकता, तो यह ज़ीनत के बजाय छुपाई हुई बचत ज़्यादा लगता है। दूसरी शर्त यह है कि ज़ेवर को वाक़ई कुछ नियमितता से पहना जाए, न कि ख़रीदकर सालों तक तिजोरी में बंद रखा जाए और सिर्फ़ ज़ेहन में “मेरे ज़ेवर” के तौर पर दर्ज कर लिया जाए बिना कभी उसका ज़ीनती मक़सद पूरा हुए। तीसरी शर्त यह है कि उसे रखने की नीयत वाक़ई ज़ाती इस्तेमाल और ज़ीनत ही हो, न कि निवेश, आगे बेचना, या बचत को एक ख़ूबसूरत शक्ल देकर ज़कात से बचना।
जो ज़ेवर सिर्फ़ दिखावे के लिए बना है मगर कभी पहना नहीं जाता, जो ज़ेवर सिर्फ़ निवेश के मक़सद से ख़रीदा गया हो भले ही उसकी शक्ल गहनों जैसी हो, और जो सोने के सिक्के या बिस्किट ज़ेवर की शक्ल में सिर्फ़ इस छूट का फ़ायदा उठाने के लिए बनाए गए हों, इन सबको हर मसलक, यहाँ तक कि वे तीन मसलक भी जो आम तौर पर असली ज़ीनत को छूट देते हैं, आम ज़कात वाला सोना ही मानते हैं।
आपको असल में किस राय पर अमल करना चाहिए
अक्सर मौजूदा उलमा और फ़तवा बोर्ड सलाह देते हैं कि आप उसी मसलक पर अमल करें जिस पर आपका या आपके ख़ानदान का पुराना अमल रहा हो। हिंदुस्तान, पाकिस्तान और मध्य एशिया की अकसरियत हनफ़ी मसलक से ताल्लुक़ रखती है, जिसका मतलब है कि ज़ेवर पर ज़कात वाजिब मानी जाती है, जबकि अरब, दक्षिण-पूर्वी एशिया और पश्चिमी अफ़्रीक़ा के बहुत से मुसलमान उन तीन मसलकों में से किसी एक पर अमल करते हैं जो पहने जाने वाले ज़ेवर को छूट देते हैं। अगर आपका किसी ख़ास मसलक से मज़बूत ताल्लुक़ नहीं है, तो बहुत से उलमा एहतियात वाली राय अपनाने की सलाह देते हैं, यानी ज़ेवर को ज़कात के दायरे में मानना, क्योंकि जिस चीज़ पर ज़कात लाज़िम न हो उसे अदा कर देना गुनाह नहीं, मगर जिस पर लाज़िम हो उसे न देना एक असली कोताही है। यह कैलकुलेटर आपको दोनों तरीक़ों के हिसाब से नतीजा दिखाता है ताकि आप देख सकें कि यह फ़र्क़ आपकी कुल रक़म पर कितना असर डालता है।
फ़ैसला करने के बाद ज़ेवर की ज़कात कैसे निकालें
अगर आप उस राय पर अमल कर रहे हैं जिसके मुताबिक़ आपका ज़ेवर ज़कात के दायरे में आता है, तो हिसाब आसान है: पहले असली सोने या चाँदी का वज़न मालूम करें (सकल वज़न नहीं, जिसमें नगीने या मिश्र धातु भी शामिल हो सकती है), फिर उसे उस प्योरिटी के मौजूदा बाज़ार भाव प्रति ग्राम से गुणा करें, इसे अपने बाक़ी ज़कात वाले सोने-चाँदी में जोड़ें, कुल रक़म को निसाब से मुक़ाबला करें, और अगर वह निसाब से ऊपर हो तो कुल क़ीमत का 2.5% अदा करें। इसमें कारीगरी, ब्रांड के मार्कअप या जज़्बाती अहमियत के लिए कोई कटौती नहीं होती; सिर्फ़ धातु की मिक़दार मायने रखती है, हालाँकि ज़ेवर में जड़े नगीनों को अलग से उनकी बिक्री क़ीमत पर आँका जाता है और अगर आप उन उलमा की राय मानते हैं जो नगीनों को भी तिजारती माल समझकर ज़कात वाजिम मानते हैं तो उन्हें जोड़ा जाता है, वरना अगर आप उन्हें निजी इस्तेमार की ज़ीनत मानते हैं तो छोड़ दिया जाता है।
मिला-जुला ज़ेवर: नगीनों, मोतियों और दूसरी धातुओं वाला सोना
ज़्यादातर ज़ेवर ख़ालिस सोना नहीं होता; उसमें आम तौर पर मज़बूती के लिए मिश्र धातु मिलाई जाती है, और अक्सर उसमें नगीने, मोती या दूसरी सजावटी चीज़ें भी होती हैं जो सोना या चाँदी बिल्कुल नहीं हैं। ज़कात के लिए आपको आम तौर पर सिर्फ़ असली सोने या चाँदी की मिक़दार वज़न और प्योरिटी के हिसाब से अलग करनी होती है (18, 21, 22 कैरेट जैसी मुहरें आम तौर पर यही बताती हैं) और सिर्फ़ उसी हिस्से पर ज़कात निकालनी होती है। हीरे, मोती और बाक़ी नगीने, ज़्यादातर उलमा के मुताबिक़, चाहे आप सोने के बारे में किसी भी मसलक पर अमल करें, ज़ाती इस्तेमार की चीज़ें मानी जाती हैं और ज़कात से मुस्तसना रहती हैं, क्योंकि वे शुरू से ही माली धातु नहीं हैं और सोने-चाँदी पर ज़कात की क्लासिकी दलीलें नगीनों तक नहीं पहुँचतीं। सर्राफ़ की रसीद या किसी आज़ाद क़ीमत लगाने वाले की रिपोर्ट, जिसमें सोने का वज़न और प्योरिटी अलग से लिखी हो, यहाँ बहुत काम आती है, और बहुत से लोग यह तफ़सील ख़रीदारी के वक़्त ही माँग लेना बेहतर समझते हैं ताकि आगे चलकर ज़कात निकालना आसान रहे।
विरासत में मिला ज़ेवर और ख़ानदानी निशानियाँ
विरासत में मिले ज़ेवर पर वही ज़कात के उसूल लागू होते हैं जो ख़रीदे गए ज़ेवर पर लागू होते हैं; आपको कोई चीज़ कैसे मिली, इससे यह नहीं बदलता कि वह ज़कात के दायरे में है या नहीं, बल्कि यह मायने रखता है कि आप उसे अभी किस तरह अपने पास रखते और इस्तेमाल करते हैं। अगर आपको कोई टुकड़ा विरासत में मिला है और आप उसे वाक़ई ज़ीनत के तौर पर पहनती हैं, तो अगर आप उन मसलकों पर अमल करती हैं जो पहने जाने वाले ज़ेवर को छूट देते हैं तो वही छूट यहाँ भी लागू होगी। मगर अगर आप विरासत में मिला ज़ेवर सिर्फ़ रखे रहती हैं, शायद अगली नस्ल को देने की नीयत से, और उसे कभी ख़ुद नहीं पहनतीं, तो ज़्यादातर उलमा इसे ज़ाती इस्तेमार के बजाय जमा की हुई दौलत के क़रीब मानेंगे, जिससे यह उन मसलकों में भी ज़कात के दायरे में आ जाएगा जो आम तौर पर ज़ीनत को छूट देते हैं, क्योंकि “असली और लगातार इस्तेमार” की शर्त पूरी नहीं हो रही।
ज़ेवर की क़ीमत लगाना: ख़रीद की रसीद या आज का बाज़ार भाव
ज़कात हमेशा आज के बाज़ार भाव पर निकाली जाती है, न कि उस क़ीमत पर जो आपने ख़रीदते वक़्त अदा की थी। सोने-चाँदी के भाव महीनों और सालों में काफ़ी बदल सकते हैं, ख़रीद और आपकी ज़कात की तारीख़ के दरमियान, तो पाँच साल पहले की रसीद पर लिखी क़ीमत आज सिर्फ़ वज़न और प्योरिटी का रिकॉर्ड रखने के काम आती है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। आपको हर साल सिर्फ़ उस प्योरिटी के मौजूदा बाज़ार भाव प्रति ग्राम की ज़रूरत होती है, जिसे अपने पास मौजूद असली धातु के वज़न से गुणा किया जाता है। बनवाई (मेकिंग चार्ज), ब्रांड का प्रीमियम और ख़रीद के वक़्त लगा मार्कअप, ज़कात वाली क़ीमत का हिस्सा नहीं हैं; सिर्फ़ आज की क़ीमत पर असली धातु की मिक़दार मायने रखती है, क्योंकि यह बनवाई एक बार अदा की गई मज़दूरी है, न कि कोई माली क़ीमत जो चीज़ के अंदर हमेशा के लिए महफ़ूज़ रहती है।
इलाक़ाई और सामाजिक फ़र्क़
अमली तौर पर, कोई इलाक़ा या समाज किस राय पर अमल करता है, यह अक्सर इस बात से जुड़ा होता है कि वहाँ ऐतिहासिक तौर पर कौन सा मसलक ग़ालिब रहा है, यही वजह है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान जैसे मुल्कों में, जहाँ हनफ़ी फिक़्ह का बोलबाला है और ज़ेवर पर ज़कात आम तौर पर दी जाती है, और ख़लीज, दक्षिण-पूर्वी एशिया या पश्चिमी अफ़्रीक़ा के कुछ हिस्सों में, जहाँ शाफ़ई या मालिकी फिक़्ह ग़ालिब है और बहुत से घराने पहने जाने वाले ज़ेवर पर ज़कात नहीं देते, ज़कात का अमल बिल्कुल अलग नज़र आता है। इनमें से कोई भी समाज ग़लत नहीं है; दोनों एक जायज़ और मुस्तनद इल्मी रिवायत पर अमल कर रहे हैं। मुश्किल ज़्यादातर उन लोगों को होती है जो परदेस में रहते हैं, अलग-अलग मसलक मानने वालों के बीच शादी में हैं, या ऐसे मल्टीकव्चरल शहरों में रहते हैं जहाँ “डिफ़ॉल्ट” राय साफ़ नहीं होती और एक सोचा-समझा फ़ैसला ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है, बनिस्बत उस समाज के जहाँ एक ग़ालिब, बेशक़ स्थानीय रिवायत मौजूद हो।
भारतीय शादियों और स्त्रीधन की रिवायत
हिंदुस्तानी मुसलमान घरानों में शादी के मौके पर सोने के ज़ेवर देने की रिवायत बहुत पुरानी और मज़बूत है, और अक्सर इसे “स्त्रीधन” जैसे आम हिंदुस्तानी सामाजिक तसव्वुर से भी जोड़कर देखा जाता है, यानी वह दौलत जो एक औरत की ज़ाती मिल्कियत मानी जाती है, चाहे वह मायके से मिली हो या ससुराल से। इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र से यह ज़ेवर पूरी तरह उस औरत की ज़ाती मिल्कियत होता है, न कि शौहर या ससुराल की मिल्कियत, और ज़कात की ज़िम्मेदारी भी उसी पर आती है, उसके शौहर पर नहीं, चाहे उसकी अपनी आमदनी हो या न हो। बहुत सी शादीशुदा हिंदुस्तानी औरतों के पास नक़द से कहीं ज़्यादा सोना होता है, और इसी वजह से यह मसला उनके लिए महज़ नज़रियाती नहीं बल्कि हर साल का एक असली मारो-दौलती फ़ैसला बन जाता है, जिसमें यह जानना ज़रूरी है कि उनके ख़ानदान का मसलक क्या कहता है और उस हिसाब से ज़कात अदा की जानी चाहिए।
हर तरीक़े के मुताबिक़ एक मिसाल
फ़र्ज़ करें किसी के पास 80 ग्राम 22 कैरेट सोने के ज़ेवर हैं जिन्हें वह ख़ानदानी तक़रीबों और मौक़ों पर नियमित तौर पर पहनती है, और आज के भाव पर उनकी क़ीमत तक़रीबन 4,80,000 रुपये है, और इसके अलावा उसके पास कोई और ज़कात वाला सोना, चाँदी या नक़द नहीं है, सिवाय एक मामूली बैंक बैलेंस के जो अकेले निसाब तक नहीं पहुँचता। हनफ़ी राय के मुताबिक़ यह ज़ेवर पूरी तरह ज़कात के दायरे में है: अगर यह निसाब से ऊपर हो (80 ग्राम सोना आम तौर पर पहुँच जाता है, क्योंकि सोने का निसाब तक़रीबन 87.48 ग्राम ख़ालिस सोना है, तो सही कैरेट और वज़न यहाँ अहम हैं, मगर बराबर की ख़ालिस-सोना-मिक़दार अक्सर बाक़ी मालो-दौलत के साथ मिलकर निसाम तक पहुँच जाती है), तो उसे 4,80,000 रुपये का 2.5%, यानी तक़रीबन 12,000 रुपये अदा करने होंगे। मालिकी, शाफ़ई या हंबली राय के मुताबिक़, अगर यह ज़ेवर वाक़ई पहना जाता है और उसकी मिक़दार उसके हालात के हिसाब से मुनासिम है, तो उस पर कुछ भी वाजिब नहीं, और अगर उसके पास कोई और ज़कात वाली दौलत न हो तो उस साल की उसकी कुल ज़कात सिफ़र भी हो सकती है।
ज़ेवर की ज़कात में आम ग़लतियाँ
यह मान लेना कि सबके लिए एक ही जवाब है। ऊपर बताए गए असली चार-मसलकी इख़्तिलाफ़ को देखते हुए, कोई एक “सही” जवाब नहीं है जो हर किसी पर लागू हो; असली जवाब हमेशा इस पर मुनहसिर है कि आप किस राय पर अमल कर रही हैं।
नगीनों के वज़न को सोने का वज़न समझ लेना। किसी भी मसलक के मुताबिक़ सिर्फ़ असली सोना या चाँदी ज़कात के दायरे में आता है; नगीनों और जड़ाव समेत सकल वज़न लेने से ज़कात वाली मिक़दार ज़्यादा निकलती है।
कभी न पहने जाने वाले ज़ेवर को छूट में शामिल कर लेना। नरम मसलकों के मुताबिक़ भी, ज़ेवर को ज़ीनत की छूट पाने के लिए वाक़ई और लगातार पहना जाना ज़रूरी है; जो ज़ेवर सिर्फ़ बचत की तरह रखा जाए और कभी न पहना जाए, वह इस छूट का हक़दार नहीं।
निसाब आँकते वक़्त ज़ेवर को बाक़ी सोने, चाँदी और नक़द के साथ जोड़ना भूल जाना। अगर आपके मसलक के मुताबिक़ ज़ेवर ज़कात के दायरे में आता है, तो उसे अपनी कुल दौलत में जोड़ना ज़रूरी है, अकेले उसी को निसाब से मुक़ाबला करना ग़लत है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या पहने जाने वाले ज़ेवर की ज़कात का कोई एक सही जवाब है?
अगर मेरे ख़ानदान का किसी ख़ास मसलक से ताल्लुक़ नहीं है तो मुझे किस पर अमल करना चाहिए?
क्या सोने के ज़ेवर में जड़े नगीनों पर भी ज़कात लगती है?
क्या जो ज़ेवर मैं कभी पहनती ही नहीं, वह भी ज़ाती-इस्तेमार की छूट का हक़दार है?
क्या विरासत में मिले ज़ेवर का हुक्म ख़रीदे गए ज़ेवर से अलग है?
क्या चारों मसलक इस मसले पर इख़्तिलाफ़ रखते हैं?
| मसलक | पहने जाने वाले ज़ेवर पर राय |
|---|---|
| हनफ़ी | इस्तेमाल से क़त्अ-ए-नज़र ज़कात के दायरे में। सोना-चाँदी ज़ेवर की शक्ल में ढलने के बाद भी अपनी माली हैसियत नहीं खोते, तो वज़न और प्योरिटी के हिसाब से 2.5% की सामान्य दर लागू होती है, इसे बाक़ी सोने, चाँदी और नक़द के साथ जोड़कर। |
| मालिकी | अगर वाक़ई जायज़ ज़ीनत के लिए मुनासिब मिक़दार में पहना जाए तो छूट; अगर जमा करके रखा जाए, न पहना जाए, या मालिक के हालात के हिसाब से ज़्यादा हो तो दोबारा ज़कात के दायरे में आ जाता है। |
| शाफ़ई | मालिकी राय जैसी शर्तों के तहत छूट: वाक़ई और लगातार, मुनासिब मिक़दार में ज़ाती इस्तेमार। बचत या निवेश की तरह रखा गया ज़ेवर यह छूट खो देता है। |
| हंबली | आम तौर पर उसी असली-इस्तेमार के उसूल पर छूट, हालाँकि कुछ हंबली उलमा तारीख़ी तौर पर एहतियात की तरफ़ ज़्यादा झुके, और आजकल के हंबली-असरदार फ़तवा बोर्ड मुनासिब-मिक़दार की शर्त को कितनी सख़्ती से लागू करते हैं, इसमें फ़र्क़ पाया जाता है। |
चूँकि यह ज़कात के इल्मी इख़्तिलाफ़ के सबसे असरदार मसलों में से एक है, इसलिए एक सोची-समझी राय अपनाना ज़रूरी है, चाहे वह ख़ानदानी रिवायत पर आधारित हो, किसी पढ़े हुए मसलक पर, या एहतियात और हनफ़ी राय के मिले-जुले तरीक़े पर, बजाय इसके कि हर साल जो जवाब सहूलत का लगे उसी को अपना लिया जाए।
यह मसला इतना अहम क्यों है
ज़ेवर अक्सर वह सबसे बड़ी दौलत होती है जिसकी एक औरत ख़ुद मालिक होती है और जिसे वह ख़ुद संभालती है, ख़ासकर उन समाजों में जहाँ सोना तारीख़ी तौर पर ज़ीनत और नस्ल-दर-नस्ल चलने वाली बचत, दोनों की हैसियत रखता आया है। इस ख़ास तरह की दौलत पर ज़कात का सही हुक्म समझना बहुत से लोगों की असल सालाना ज़कात की ज़िम्मेदारी पर एक बड़ा असर डालता है, बनिस्बत उन ज़्यादा नज़रियाती श्रेणियों के जैसे ओशर, जो ज़्यादातर कैलकुलेटर इस्तेमार करने वालों पर लागू ही नहीं होतीं। यह समझना कि यहाँ का इख़्तिलाफ़ असली है, न कि इस्लामी शरीयत में किसी उलझन या तज़ाद की निशानी, लोगों को एक सोचा-समझा और मालूमाती फ़ैसला लेने में मदद देता है, बजाय इसके कि वे बेवजह फ़िक्र में ज़्यादा अदा कर दें या किसी ऐसी छूट को मान लें जो उनके मसलक या हालात पर लागू ही नहीं होती।
अपनी ज़कात निकालने के लिए तैयार हैं, ज़ेवर समेत, दोनों तरीक़ों के मुताबिक़?
ज़कात कैलकुलेटर खोलेंयह वेबसाइट सिर्फ़ एक हिसाब लगाने का औज़ार है, फ़तवा देने का इदारा नहीं। अपने ख़ास मामले के लिए किसी मुस्तनद आलिम या अपने स्थानीय ज़कात इदारे से मशवरा करें।
स्रोत: AAOIFI शरीयत मानदंड (ज़कात हिसाब), शास्त्रीय हनफ़ी फ़िक़्ह (सोना-चाँदी), शास्त्रीय मालिकी, शाफ़ई और हंबली फ़िक़्ह (ज़ाती-इस्तेमार की छूट), समकालीन फ़तवा बोर्डों का ज़ेवर ज़कात संबंधी मार्गदर्शन।
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